Explainer : हाइड्रोजन-हवा से दौड़ने वाली Made in India बस कैसे करती है काम, क्‍या-क्‍या हैं इसके बड़े फायदे?

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नई दिल्‍ली. प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन पर दुनियाभर में लगातार बातचीत हो रही है. इन सबको ध्यान में रखते हुए भारत में पहली मेड इन इंडिया हाइड्रोजन फ्यूल सेल बस (Hydrogen Fuel Cell Bus) लॉन्च की गई है. इस बस में इलेक्ट्रिसिटी जेनरेट करने के लिए हाइड्रोजन और हवा का इस्तेमाल किया गया है. इस दौरान यह सिर्फ हीट और वाटर ही प्रोड्यूस करेगी. दावा किया जा रहा है कि इस बस के बाय-प्रोडक्ट से पर्यावरण को किसी तरह का खतरा नहीं है. अगर यह सफल रहा तो देशभर में इस तरह की बस सड़कों पर दौड़ती हुई नजर आएंगी.

हाइड्रोजन फ्यूल सेल है क्या?
अमेरिकी ऊर्जा विभाग के अनुसार, इलेक्ट्रिक गाड़ियों में जिस तरह से पारंपरिक बैटरी काम करती है, ठीक उसी तरह फ्यूल सेल्स भी काम करते हैं. लेकिन, इन्हें चार्ज करने के लिए इलेक्ट्रिसिटी की जरूरत नहीं पड़ती है. जबतक उन्हें हाइड्रोजन की सप्लाई होती रहेगी, ये इलेक्ट्रिसिटी प्रोड्यूस करते रहेंगे. कन्वेंशनल सेल की ही तरह फ्यूल सेल में एनोड और कैथोड इलेक्ट्रोलाइट के चारों तरफ रहते हैं.

यहां हाइड्रोन एनोड से संचित मतलब फेड होता है. वहीं, हवा कैथोड से फेड होता है. एनोड के केस में उत्प्रेरक हाइड्रोजन मॉलिक्यूल को प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन में अलग करते हैं और दोनों ही सबएटॉमिक पार्टिकल कैथोड में अलग-अलग रास्ता लेते हैं. इलेक्ट्रॉन एक्सटर्नल सर्किट के जरिये प्रवाहित होकर सर्किट में इलेक्ट्रिसिटी का फ्लो करता है, जिसका इस्तेमाल पॉवर इलेक्ट्रिक मोटर्स में किया जाता है. दूसरी तरफ, प्रोटॉन इलेक्ट्रोलाइट के जरिये कैथोड में प्रवाहित होता है. एक बार जब वे ऑक्सीजन और इलेक्ट्रॉन के साथ संयुक्त होते हैं तो वाटर और हीट प्रोड्यूस करते हैं.

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इससे फायदा क्या होगा?
हाइड्रोजन फ्यूल सेल का सबसे बड़ा असर पर्यावरण पर पड़ेगा, क्योंकि इससे चलने वाला इलेक्ट्रिकल व्हीकल किसी तरह का टेलपाइप इमिशन प्रोड्यूस नहीं करता है. वे सिर्फ वाटर वेपर ही निकालते हैं और हवा को गर्म करते हैं. दूसरी अच्छी चीज ये है कि ये इंटर्नल कंबसन इंजन व्हीकल के मुकाबले ज्यादा एफिशिएंट हैं.

रिफ्यूलिंग का कम समय
अगर पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन के उद्देश्य से देखें तो सबसे बड़ा फायदा रिफ्यूलिंग में दिखता है. बैटरी पॉवर्ड इलेक्ट्रिक व्हीकल की तुलना में इसे रिफ्यूल करना आसान है. यह कुछ ही मिनटों में रिफ्यूल हो जाता है, जबकि बैटरी वाली बसों को चार्ज करने में घंटो लग जाता है. कुछ देशों में हाइड्रोजन फ्यूल वाले वाहनों पर कम टैक्‍स लगता है. एक बार इसका टैंक भरवाने पर 482 किमी से लेकर 1000 किमी तक की दूरी तय की जा सकती है.

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पर्यावरण पर असर
देश में ऊर्जा सबसे ज्यादा फॉसिल फ्यूल यानी पेट्रोल-डीजल से मिलती है. दूसरी तरफ, दुनिया में हाइड्रोजन का सबसे बड़ा सोर्स भी फॉसिल फ्यूल ही है. ऐसे में इनसे चलने वाली गाड़ियां बड़ी मात्रा में उत्सर्जन करती हैं. लेकिन, जैसे ही हम इलेक्ट्रिसिटी के रिन्यूवेबल की तरफ बढ़ते हैं तो हम हाइड्रोजन जेनरेट करने के लिए भी रिन्यूवेबल मेथड की तरफ बढ़ सकते हैं. ये बहुत ही कम मात्रा में ग्रीनहाउस का उत्सर्जन करते हैं. इनसे उत्सर्जित वायु स्वास्थ्य के लिए हानिकार भी नहीं होती है.

क्या हैं चुनौतियां
सिक्योरिटी सबसे बड़ी चुनौती है. हाइड्रोजन पेट्रोल से ज्यादा ज्वलनशील है. ऐसे में आसानी से विस्फोट की आंशका जताई जा रही है. इसकी कीमत पर भी बात हो रही है कि ये ज्यादा हो सकती है. ईंधन के केंद्रों का कैसे डिस्ट्रिब्यूशन होगा, यह भी बड़ा सवाल है.

Tags: Air pollution, E-Vehicle, Electric Bus, Environment news, Hydrogen

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